दादू के प्रमुख पदों की सप्रसंग व्याख्या

पद 1 दादू नमो नमो निरंजन, नमस्कार गुरु देवतह। वंदनं श्रव साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥

  • कठिन शब्द: निरंजन = मायारहित परमब्रह्म, देवतह = देवताओं (या दिव्य पुरुषों), श्रव = श्रवण / सभी, साधवा = संतों, पारंगत: = भवसागर से पार उतरे हुए ज्ञानी।
  • प्रसंग: यह पद संत दादूदयाल जी की रचना ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से लिया गया है। इसमें संत दादू ने परमब्रह्म, गुरु और संतों के प्रति अपनी वंदना और नमन भाव व्यक्त किया है।
  • व्याख्या: दादूदयाल जी कहते हैं कि मायारहित निरंजन परमब्रह्म को बार-बार नमस्कार है, तथा गुरुदेव को भी मेरा प्रणाम है। इसके साथ ही सभी संतों और भवसागर को पार करने वाले (पारंगत) ज्ञानी जनों को मेरा बार-बार वंदन और प्रणाम है।

पद 2 एकै अधिर पीव का, सोई सति करि जांणि। राम नाम सत गुर कह्या, सो दादू परवांणि ॥ 2 ॥

  • कठिन शब्द: अधिर = आधार, पीव = प्रियतम (परमात्मा), सति = सत्य, जांणि = जानो, परवांणि = प्रमाणिक / स्वीकार्य।
  • प्रसंग: प्रस्तुत पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से उद्धृत है। इसमें सच्चे आराध्य और गुरु के वचनों की प्रामाणिकता पर बल दिया गया है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि इस संसार में एकमात्र परमात्मा (पीव) ही सबका सच्चा आधार है, उसी को सत्य मानो। गुरु ने जो राम-नाम का उपदेश दिया है, वही एकमात्र सत्य है और दादू के लिए वही पूरी तरह प्रमाणिक है।

पद 3 पहली श्रवण दुजी रसन, तृतीय हिरदै गाइ। चतुरदसी चेतनि भया, तब रोम-रोम ल्यौ लाइ ॥ 3 ॥

  • कठिन शब्द: श्रवण = कान (सुनना), रसन = रचना/जीभ (उच्चारण करना), हिरदै = हृदय, चतुरदसी = चौदहवें / चतुर्दिक (या पूर्ण रूप से), चेतनि = चेतन/जागृत, ल्यौ लाइ = ध्यान लगाना।
  • प्रसंग: यह पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें ईश्वर के स्मरण की क्रमिक पद्धतियों और चरणों का वर्णन किया गया है।
  • व्याख्या: ईश्वर-स्मरण का क्रम यह है कि पहले कानों से भगवान का यश सुनो, दूसरी बार जीभ से उसका उच्चारण करो, और तीसरे चरण में उसे हृदय में गाओ (बसाओ)। जब मन पूरी तरह चेतन हो जाता है, तब शरीर का रोम-रोम ईश्वर की भक्ति में लीन हो जाता है।

पद 4 दादू नीका नाव है, तीन लोक, ततसार। रति दिवस रटिबो करी, रे मन इहै विचार ॥ 4 ॥

  • कठिन शब्द: नीका = सुंदर/श्रेष्ठ, नाव = नाम, ततसार = तत्वों का सार, रति दिवस = रात-दिन, रटिबो = रटना।
  • प्रसंग: प्रस्तुत पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से लिया गया है, जिसमें राम-नाम के स्मरण को तीनों लोकों का सार बताया गया है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि ईश्वर का नाम ही सबसे श्रेष्ठ और तीनों लोकों का मूल तत्व (सार) है। हे मन! तू यही विचार कर और रात-दिन निरंतर उसी नाम का स्मरण (रट) करता रह।

पद 5 दादू नीका नांव है, हरि हिरदै न बिसारि। मूरति मन माँहै बसे, साँसै सास संभारि ॥ 5 ॥

  • कठिन शब्द: बिसारि = भुलाना, मूरति = मूर्ति/छवि, माँहै = में, साँसै सास = सांस-सांस के साथ, संभारि = संभालकर/याद रखकर।
  • प्रसंग: यह पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें भगवान के नाम और उनकी छवि को हृदय में बसाने का उपदेश दिया गया है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि ईश्वर का नाम बहुत सुंदर है, इसलिए भगवान को अपने हृदय से कभी मत भुलाना। उनकी छवि को अपने मन में बसाए रखो और अपनी प्रत्येक श्वास के साथ उनका स्मरण करो।

पद 6 दादू साँसै सांस संभारतां, इकदिन मिलि है आइ। सुमिरन पैंडा सहज का, सो गुरि दिया दिषाइ ॥ 6 ॥

  • कठिन शब्द: संभारतां = संभालते हुए / स्मरण करते हुए, पैंडा = मार्ग/रास्ता, सहज का = स्वाभाविक भक्ति का, गुरि = गुरु ने, दिषाइ = दिखाया।
  • प्रसंग: प्रस्तुत पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से उद्धृत है। इसमें निरंतर स्मरण से परमात्मा की प्राप्ति और सहज मार्ग का वर्णन है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि श्वास-श्वास में ईश्वर का स्मरण करते रहने से एक दिन वह परमात्मा स्वयं आकर मिल जाता है। यह सहज भक्ति का मार्ग है, जिसे गुरु ने कृपा करके दिखाया है।

पद 7 राम भजन का सोच क्या, करतां होइ स होइ। दादू राम संभालिए, फिरि बूझिए न कोइ ॥ 7 ॥

  • कठिन शब्द: सोच = चिंता, करतां = करने वाले (ईश्वर) की इच्छा से, संभालिए = स्मरण करो, बूझिए = पूछना/जानना।
  • प्रसंग: यह पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें भविष्य की चिंता छोड़कर केवल राम-भजन करने पर बल दिया गया है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि राम के भजन में किसी प्रकार की चिंता या संशय नहीं करना चाहिए, संसार में जो कुछ होना है वह ईश्वर की इच्छा से ही होता है। तुम केवल राम का स्मरण करो, इसके बाद किसी अन्य से कुछ पूछने या भटकने की आवश्यकता नहीं रहती।

पद 8 दादू कहै राम तुम्हारे नांव बिन, जे मुष निकसै और। तौ इस अपराधी जीव कूं, तीनि लोक कत तौर ॥ 8 ॥

  • कठिन शब्द: मुष = मुख, निकसै = निकले, कूं = को, तीनि लोक = तीनों लोक, कत तौर = कहाँ स्थान / कौन सा ठिकाना।
  • प्रसंग: प्रस्तुत पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें राम-नाम के बिना जीवन की व्यर्थता और उसके परिणामों को बताया गया है।
  • व्याख्या: दादूदयाल जी कहते हैं कि हे राम! तुम्हारे नाम के बिना यदि इस मुख से कोई अन्य व्यर्थ बात निकले, तो इस अपराधी जीव के लिए तीनों लोकों में कहीं भी रहने का ठिकाना नहीं है (अर्थात उसका पतन निश्चित है)।

पद 9 दादू छिन छिन राप संभालतां, जे जीव जाइ त जाव। आतम के आधार कूं, नांही आंन उपाव ॥ 9 ॥

  • कठिन शब्द: छिन छिन = क्षण-क्षण, राप = राम (या निरंतर), संभालतां = संभालते/स्मरण करते, आतम = आत्मा, आधार = सहारा, आंन = अन्य, उपाव = उपाय।
  • प्रसंग: यह पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें हर क्षण राम-नाम के स्मरण को ही आत्मा का एकमात्र साधन बताया गया है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि क्षण-क्षण निरंतर राम-नाम का स्मरण करते रहो, भले ही इस प्रक्रिया में शरीर का प्राण (जीव) ही क्यों न चला जाए। आत्मा के उद्धार और सहारे के लिए इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा उपाय नहीं है।

पद 10 एक महरत मन रहै, नांव निरंजन पास। दादू तबही देषतां, सकल करम का नास ॥ 10 ॥

  • कठिन शब्द: महरत = मुहूर्त / पलभर, देषतां = देखते ही / अनुभव करते ही, सकल = समस्त, करम = कर्मों (संस्कारों), नास = नाश।
  • प्रसंग: प्रस्तुत पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से उद्धृत है। इसमें एकाग्रता और निरंजन के स्मरण से कर्मों के नाश का वर्णन है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि यदि मन एक पल (मुहूर्त) के लिए भी पूर्ण रूप से निरंजन (परमात्मा) के नाम में लीन हो जाए, तो उसी समय साधक के समस्त संचित कर्मों और बंधनों का नाश हो जाता है।

पद 11 सहजै ही सब होइगा, गुण मंडी का नास। दादू राम संभालतां, कटे करम के पास ॥ 11 ॥

  • कठिन शब्द: सहजै = स्वाभाविक रूप से, गुण मंडी = विकारों और गुणों का बाजार (माया), पास = फंदा / बंधन।
  • प्रसंग: यह पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें राम-स्मरण से सांसारिक विकारों के नाश और कर्म-बंधनों के कटने की बात कही गई है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि राम का स्मरण करते रहने से जीवन में सब कुछ सहज ही हो जाता है, मन की विकारों और माया की मंडी (प्रपंच) समाप्त हो जाती है और जन्म-मृत्यु तथा कर्मों के सभी बंधन कट जाते हैं।

पद 12 एक राम के नांव बिन, जीव की जलणि न जाइ। दादू केते पचि मुए, करि करि बहुत उपाि ॥ 12 ॥

  • कठिन शब्द: जलणि = जलन / तृष्णा की तपन, केते = कितने ही लोग, पचि मुए = प्रयत्न करके थक-हार कर मर गए, उपाि = उपाय।
  • प्रसंग: प्रस्तुत पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें राम-नाम के बिना आंतरिक शांति न मिलने और तृष्णा की आग बने रहने का वर्णन है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि एकमात्र राम के नाम के बिना इस जीव की सांसारिक तृष्णा और संताप की जलन शांत नहीं होती। इस संसार में कितने ही लोग अन्य तमाम उपाय करके थक-हारकर मर गए, पर शांति नहीं पाई।

पद 13 दादू एक राम की टेक गहि, दूजा सहजि सुभाइ। राम नांव छाड़े नहीं, दूजा आवै जाइ ॥ 13 ॥

  • कठिन शब्द: टेक गहि = एकनिष्ठ आश्रय लेना / संकल्प करना, सहजि = सहज रूप से, सुभाइ = स्वभाव से, छाड़े = छोड़े।
  • प्रसंग: यह पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें एक राम की अनन्य भक्ति और टेक पकड़ने का उपदेश है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि तुम केवल एक राम की टेक (संकल्प) पकड़ो, बाकी सब कुछ सहज स्वभाव से छोड़ दो। राम के नाम को कभी मत छोड़ो, क्योंकि संसार की अन्य वस्तुएं और प्रपंच तो आते-जाते (नश्वर) रहते हैं।

पद 14 दादू राम अगाध है, परमिति नाहीं पार। अवरन वरन न जानिये, दादू नांइ अधार ॥ 14 ॥

  • कठिन शब्द: अगाध = अथाह / जिसकी थाह न हो, परमिति = सीमा, अवरन वरन = वर्ण और रंग / भेद-भाव, अधार = आधार।
  • प्रसंग: प्रस्तुत पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें ईश्वर की अगाधता और उसके नाम को ही एकमात्र आधार बताया गया है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि परमात्मा (राम) अथाह है, उसकी कोई सीमा या पार नहीं है। उसका कोई विशेष वर्ण या रूप नहीं जाना जा सकता, ऐसे अगाध प्रभु का केवल नाम ही हमारा एकमात्र आधार है।

पद 15 दादू राम अगाध है, अविगति लषै न कोइ। नृगुण श्रगुण का कहै, नांइ बिलंब न होइ ॥ 15 ॥

  • कठिन शब्द: अविगति = अलख गति / रहस्य, लषै = जान पाना / देखना, नृगुण = निर्गुण, श्रगुण = सगुण, बिलंब = देर।
  • प्रसंग: यह पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें ईश्वर की अगाध गति और निर्गुण-सगुण के परे उसके स्मरण पर बल दिया गया है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि राम अथाह हैं, उनकी अलख गति को कोई पूरी तरह नहीं जान सकता। कोई निर्गुण कहता है तो कोई सगुण, किंतु भगवान के स्मरण में तनिक भी विलंब (देर) नहीं करनी चाहिए।

पद 16 दादू राम अगाध है, बेहद लष्या न जाइ। आदि अंति नही जानिये, नांउ निरंतर गाइ ॥ 16 ॥

  • कठिन शब्द: बेहद = जिसकी कोई सीमा न हो, लष्या = लक्षित / अनुभव किया जाना, आदि अंति = शुरुआत और अंत।
  • प्रसंग: प्रस्तुत पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें ईश्वर के असीम स्वरूप और निरंतर नाम-गान की महिमा बताई गई है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि राम अगाध और असीम हैं, उन्हें सामान्य रूप से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। न तो उनकी आदि (शुरुआत) का पता है और न अंत का, इसलिए हे मनुष्य! तू निरंतर उनके नाम का ही गान करता रह।

पद 17 दादू राम अगाध है, अकल अगोचर एक। दादू नांइ विलंबये, साधू कहैं अनेक ॥ 17 ॥

  • कठिन शब्द: अकल = कलातीत / बुद्धि से परे, अगोचर = इंद्रियों की पहुँच से बाहर, विलंबये = विलंब / देर करना।
  • प्रसंग: यह पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें ईश्वर के अकल और अगोचर स्वरूप का वर्णन करते हुए साधुओं के वचनों को रेखांकित किया गया है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि राम अथाह, बुद्धि से परे (अकल) और इंद्रियों के अगोचर एकमात्र सत्ता हैं। नाम स्मरण में बिल्कुल भी देर मत करो, सभी साधु-संत यही अनेक बार कहते आए हैं।

पद 18 दादू एकै अलह राम है, संमथ सांई सोइ। मैदे के पकवांन सब, घातां होइ स होइ ॥ 18 ॥

  • कठिन शब्द: अलह = अल्लाह (ईश्वर), संमथ = समर्थ, सांई = स्वामी, मैदे के पकवांन = मैदे से बने विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्न, घातां = सांचे / प्रकार।
  • प्रसंग: प्रस्तुत पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें ईश्वर की एकता (अद्वैत) का प्रतिपादन करते हुए राम और अल्लाह को एक ही बताया गया है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि अल्लाह और राम एक ही हैं, वही समर्थ स्वामी (साईं) है। जिस प्रकार मैदे से ही विभिन्न प्रकार के पकवान (अलग-अलग रूपों में) बनाए जाते हैं, वैसे ही उस एक ही परमात्मा के अनेक रूप और नाम हैं।

पद 19 दादू श्रगुण नृगुण द्वै रहे, जैसा हो तैसा लीन्ह। हरि सुमिरन ल्यौ लाइये, का जांणों का कीन्ह ॥ 19 ॥

  • कठिन शब्द: श्रगुण = सगुण, नृगुण = निर्गुण, द्वै = दोनों, लीन्ह = स्वीकार किया, ल्यौ लाइये = ध्यान लगाइए, का जांणों = क्या जाने क्या होगा।
  • प्रसंग: प्रस्तुत पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से है। इसमें सगुण और निर्गुण दोनों रूपों को एक ही परमात्मा का स्वरूप मानकर हरि-स्मरण में मन लगाने की बात कही गई है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि सगुण और निर्गुण दोनों रूप उसी एक परमात्मा के हैं, साधक ने जैसा अनुभव किया वैसा स्वीकार कर लिया। तुम तो केवल हरि के स्मरण में अपनी लौ लगाओ, आगे भगवान जाने क्या करेगा (सब उसी पर छोड़ दो)।

पद 20 दादू सिरजनहार के, केते नांव अनंत। चिति आवै सो लीजिए, यूंद साधू सुमिरें संत ॥ 20 ॥

  • कठिन शब्द: सिरजनहार = सृष्टि की रचना करने वाला (परमात्मा), केते = कितने ही, अनंत = अनगिनत, चिति आवै = चित्त में आ जाए / स्मरण हो जाए, यूंद = इस प्रकार।
  • प्रसंग: प्रस्तुत पद ‘दादूवाणी’ के ‘सुमिरन कौ अंग’ से उद्धृत है। इसमें ईश्वर के अनंत नामों और संतों द्वारा उनके स्मरण की सहज पद्धति का वर्णन है।
  • व्याख्या: दादूजी कहते हैं कि इस सृष्टि के सृजनहार (परमात्मा) के अनगिनत और अनंत नाम हैं। तुम्हारे चित्त में जो भी नाम सहज भाव से आ जाए, उसी को ग्रहण कर लो—संत और साधुजन इसी प्रकार भगवान का स्मरण करते हैं।
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Dilip Beniwal
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